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खोइछा : लोक संस्कारों की एक अटूट परम्परा डॉ. तरु मिश्रा ,

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लोक जीवन में बहुत से ऐसे संस्कार हैं जिनका संबंध क्षेत्र विशेष से रहता है । संस्कारों और प्रकृति के प्रति लगाव की दृष्टि से उत्तर प्रदेश और बिहार की भूमि अत्यंत उर्वर रही है । यह उर्वरता ग्राम्य जीवन में  आधार स्तम्भ रूप में विद्यमान है । जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे जीवन में संस्कारों का निर्वहन देखने को मिलता है । संस्कारों का विकास हमारे जीवन की विविध चरणों में हुआ है। जैसे- जैसे समाज विकसित होता गया, वैसे-वैसे सभ्यतागत आवश्यकताओं के अनुरूप संस्कार भी निर्मित होते गये । संस्कारों के निर्माण में सामाजिक जीवन के साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक कारणों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है ।   बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों में खोइछा बेहद आम शब्द है। खोइछा (Khoichha) शब्द सुनते ही न जाने कितनी भावनाएं और कितना नेह जुड़ जाता है लोगों के मन में। शादीशुदा लड़कियों के लिए खोइछा शब्द सुनते ही मां, मायके का वो आंगन, सब उनकी आंखों के सामने आ जाता है। दरअसल खोंइछा वह अनमोल उपहार है जो नैहर(मायका) से ससुराल जाते वक्त विदाई के वक्त मां, भाभी या परिवार की कोई दूसरी सुहागिन महिला लड़की...

पूर्वांचल में पर्व, पूजा एवं अध्यात्म : डा. पल्लवी अस्थाना (असिस्टन्ट प्रोफेसर- इंजीनियरिंग) , ऐमिटी यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश ,लखनऊ कॅम्पस लखनऊ

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अध्यात्म का अर्थ है 'आत्मा' का अध्ययन अर्थात हमारे स्वयं के होने का अध्ययन करना । व्यक्ति अपने अंदर की आत्मा से साक्षात्कार करते हुये परमात्मा तक पहुँचने की चेष्टा में जिस मार्ग पर चलता है, उसे ही आध्यात्मिकता कहते है।  भारतीय दर्शन में अध्यात्म बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योकिं आत्मा का परमात्मा से मिलन जीवन की पराकाष्ठा एवं संपूर्णता का द्योतक है। ऐसा भी माना जाता है कि संपूर्णता को प्राप्त करने में कुछ वर्ष नहीं, अपितु कई जन्म लग सकते हैं। इसीलिये भारतीयू दर्शन के अनुसार यात्रा व्यक्ति की नहीं बल्कि उसकी आत्मा की होती है। अनेकों मार्ग से होते हुये व्यक्ति स्वयं को उस अनंत से जोडना चाहता है, जहाँ पर जीवन अनंत में लीन हो जाये और परम तत्त्व से एकात्मता का अनुभव करे | ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ इस श्लोक का अर्थ है - वह (अद:) परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से पूर्ण है। यह जगत भी पूर्ण है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्...

Heeraman Aur Heerabai

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  गाड़ीवान 'हीरामन' अपनी बैलगाड़ी में 'हीराबाई' को लेकर फारबिसगंज के मेले में छोड़ने जा रहा है ... तभी फिज़ा में गूंजते गीत को सुन हीराबाई कहती है ... यहां देखती हूँ, हर कोई गीत गाता रहता है ... गीत नहीं गायेगा तो करेगा क्या, कहते हैं ,,,, 'फटे कलेजा गाओ गीत, दुःख सहने का एहि रीत ...' तुम्हारे यहां की भाषा में गीत और भी मीठा लगता है। लगता है, बस सुनती ही रहूँ ... ये महुआ घटवारिन का गीत है, वो कजरी नदी का घाट था न ,,,, बस उसी का ... अच्छा, तुम्हें आता है ये गीत ,,,, सुनाव न मीता ... इस्स ,,,, गांव का गीत सुनने का बड़ा सौख है, आपको ... "... वो जो महुआ घटवारिन का घाट था न, उसी मुलुक की थी महुआ ,,,, थी तो घटवारिन, लेकिन सौ सतवंती में एक ,,,, उसका बाप दिन दिहाड़े ताड़ी पी के बेहोस पड़ा रहता था ,,,, उसकी सौतेली माँ थी साक्षात राक्षसनी ,,,, महुआ कुंवारी थी ,,,, भरी पूरी दुनिया में कोई न था उसका ..." दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनायी, तुने काहे को दुनिया बनायी ... दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनायी, तुने काहे को ...

तुलसीदास कृत रामचरितमानस और लोक नायक की वैश्विक प्रासंगिकता : एक विवेचन

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  भारतीय जीवन में आध्यात्मिकता एवं भक्ति की धारा अनादिकाल से प्रवाहित होती रही है । भारत में भक्ति का समारम्भ कब और कहाँ से हुआ यह पता लगा पाना अत्यंत कठिन कार्य है । हमारे आदिम जीवन से लेकर आज तक की जीवन पद्धति का अवलोकन करें तो यह स्पष्ट ही देखने को मिलता है कि प्राकृतिक अवयवों के पूजन से जो परम्परा आरम्भ हुई समयानुसार परिवर्तित होते हुए समाज की भाव-भंगिमा के अनुसार परिमार्जित होती रही है । अग्नि, वायु, सूर्य, जल एवं अन्य प्राकृतिक अवयवों के प्रति श्रद्धा का भाव हमारी चेतना का हिस्सा रही है । भक्ति और आध्यात्मिकता वह प्राणतत्व है , जो भारतीय जीवन को आलोकित करता रहा है । भक्ति और प्रतिमा पूजन की प्राचीनता को रेखांकित करते हुए राष्ट्र कवि एवं प्रसिद्ध चिन्तक रामधारी सिंह दिनकर जी ने अपनी पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय ’ में लिखा है कि – “ प्रतिमा-पूजन के निशान मोहनजोदड़ो में मिले हैं , इससे यह अनुमान होता है कि भक्ति भारत का सनातन जन-धर्म थी और आर्यों के पहले से ही वह इस देश में प्रचलित थी । आर्यों के आगमन के बाद आर्य तो हवन- कर्म द्वारा ही अपने देवताओं को प्रसन्न करते रहे, किन...

मेरी कविताएं....

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 बहुत करीने से गढ़ा है हमने खुद को। यूं ही बेबजह जिन्दगी का हिसाब न कर बेहिसाब हूँ मैं तू अपने हिसाब में रह। पुरानी बातें जो हैं उन्हें वैसा ही रहने दे। उन मेल-मुलाकातों का मोल - तोल ना कर।  बेहिसाब हूँ मैं तू हिसाब-किताब में रह। (अमरेन्द्र) घोंसले ही नियति नहीं हैं परिन्दों की आसमानों और ऊंचाईयों की दूरियां भी उनकी मंजिल नहीं । यायावरी और जोखिम है हर पल उनके जेहन में। ना घर ना शहर और ना ही देश की परिधि उन्हें रोक सकेगी। हमारी नियति है घर, नगर और देश। आजाद नहीं हैं हम-परिन्दों के मांनिद। (अमरेन्द्र)