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भारतीय भाषाओं की सांस्कृतिक भूमिका : डॉ. अमरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

भारत एक अत्यंत प्राचीन और आध्यात्मिक चेतना से सम्पन्न राष्ट्र है , अनेकता में एकता हमारे देश का सार-तत्व अनादि काल से रहा है और आज भी है । इसी विशेषता के कारण हमारे यहाँ बहुआयामी संस्कृति और विविधता पूर्ण समाज-व्यवस्था देखने को मिलती रही है । बहुआयामी संस्कृति और विविधता-पूर्ण समाज व्यवस्था के कारण हमारे देश में भाषाई विविधता भी देखने को मिलती रही रही है। प्राचीन काल से लेकर अब तक देखा जाए तो हमारे देश में अनेकों भाषाएं और विविध भाषा परिवार का वैविध्यपूर्ण संयोजन देखने को मिलता है । हमारी सभ्यता और संस्कृति के संवहन में भारतीय भाषाओं का विशेष योगदान है। इसी कारण बहु-भाषिकता हमारी पहचान रही है और हमारी बहु-संस्कृतिवादी दृष्टि को इससे बाल मिलता है । भारत एक बहुभाषी और बहु-सांस्कृतिक देश है , जहाँ भाषाएँ केवल संचार का साधन नहीं , बल्कि सांस्कृतिक पहचान और परंपरा की वाहक हैं। भारतीय संविधान ने 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषाओं के रूप में मान्यता दी है , जबकि देश में सैकड़ों बोलियाँ प्रचलित हैं। यह भाषाई विविधता भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का आधार है। “एकता में विविधता” का आदर्श भारतीय भाषाओं ...

पूर्वाञ्चल के लोक संस्कारों और कृषि का पर्व : नेवान (नवान्न): डा. अमरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

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  वैदिक काल से लेकर आज तक भारतीय समाज में शास्त्र एवं लोक का सामंजस्य देखने को मिलता है । भारतीय जीवन पद्धति लोक कि धारा वह धारा है, जो अनादि काल से हमारे जीवन से सिंचित करती रही है । लोक जीवन कि विविधता और विस्तार ही वह स्रोत है, जिससे हमारे समाज में उल्लास का संचार होता रहा है । विविधता एवं विस्तार का आधार हमारी कृषि प्रधान संस्कृति रही है । धरती और प्रकृति का हमारी लोक परम्परा एवं संस्कृति में विशेष महत्व रहा है । हमारा लोक न सिर्फ विविधताधर्मी है वरन बेहतर जीवन जीने के लिए एक मजबूत आधार भी प्रदान करता है । लोक कि सरसता में कुछ वैज्ञानिक तत्वों का समावेश भी देखने को मिलता है । लोक कि सरसता एवं वैज्ञानिकता भारत के सभी क्षेत्रों के लोक में देखी जा सकती है । पूर्वी उत्तर प्रदेश कि लोक परम्परा अत्यंत समृद्ध एवं सुदृढ़ रही है । ‘पूर्वाञ्चल की पोटली’ में कला, संस्कृति , सभ्यता, गीत-संगीत, कथा और नाट्य की व्यापक एवं प्राचीन परम्परा के साथ-साथ खेती किसानी से जुड़ी परम्पराओं का भी समावेश देखने को मिलता है । समय के साथ ही हम अपनी जड़ों और परम्पराओं से दूर होते जा रहे हैं । जिस तरह से उत...

खोइछा : लोक संस्कारों की एक अटूट परम्परा डॉ. तरु मिश्रा ,

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लोक जीवन में बहुत से ऐसे संस्कार हैं जिनका संबंध क्षेत्र विशेष से रहता है । संस्कारों और प्रकृति के प्रति लगाव की दृष्टि से उत्तर प्रदेश और बिहार की भूमि अत्यंत उर्वर रही है । यह उर्वरता ग्राम्य जीवन में  आधार स्तम्भ रूप में विद्यमान है । जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे जीवन में संस्कारों का निर्वहन देखने को मिलता है । संस्कारों का विकास हमारे जीवन की विविध चरणों में हुआ है। जैसे- जैसे समाज विकसित होता गया, वैसे-वैसे सभ्यतागत आवश्यकताओं के अनुरूप संस्कार भी निर्मित होते गये । संस्कारों के निर्माण में सामाजिक जीवन के साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक कारणों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है ।   बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों में खोइछा बेहद आम शब्द है। खोइछा (Khoichha) शब्द सुनते ही न जाने कितनी भावनाएं और कितना नेह जुड़ जाता है लोगों के मन में। शादीशुदा लड़कियों के लिए खोइछा शब्द सुनते ही मां, मायके का वो आंगन, सब उनकी आंखों के सामने आ जाता है। दरअसल खोंइछा वह अनमोल उपहार है जो नैहर(मायका) से ससुराल जाते वक्त विदाई के वक्त मां, भाभी या परिवार की कोई दूसरी सुहागिन महिला लड़की...

पूर्वांचल में पर्व, पूजा एवं अध्यात्म : डा. पल्लवी अस्थाना (असिस्टन्ट प्रोफेसर- इंजीनियरिंग) , ऐमिटी यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश ,लखनऊ कॅम्पस लखनऊ

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अध्यात्म का अर्थ है 'आत्मा' का अध्ययन अर्थात हमारे स्वयं के होने का अध्ययन करना । व्यक्ति अपने अंदर की आत्मा से साक्षात्कार करते हुये परमात्मा तक पहुँचने की चेष्टा में जिस मार्ग पर चलता है, उसे ही आध्यात्मिकता कहते है।  भारतीय दर्शन में अध्यात्म बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योकिं आत्मा का परमात्मा से मिलन जीवन की पराकाष्ठा एवं संपूर्णता का द्योतक है। ऐसा भी माना जाता है कि संपूर्णता को प्राप्त करने में कुछ वर्ष नहीं, अपितु कई जन्म लग सकते हैं। इसीलिये भारतीयू दर्शन के अनुसार यात्रा व्यक्ति की नहीं बल्कि उसकी आत्मा की होती है। अनेकों मार्ग से होते हुये व्यक्ति स्वयं को उस अनंत से जोडना चाहता है, जहाँ पर जीवन अनंत में लीन हो जाये और परम तत्त्व से एकात्मता का अनुभव करे | ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ इस श्लोक का अर्थ है - वह (अद:) परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से पूर्ण है। यह जगत भी पूर्ण है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्...

Heeraman Aur Heerabai

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  गाड़ीवान 'हीरामन' अपनी बैलगाड़ी में 'हीराबाई' को लेकर फारबिसगंज के मेले में छोड़ने जा रहा है ... तभी फिज़ा में गूंजते गीत को सुन हीराबाई कहती है ... यहां देखती हूँ, हर कोई गीत गाता रहता है ... गीत नहीं गायेगा तो करेगा क्या, कहते हैं ,,,, 'फटे कलेजा गाओ गीत, दुःख सहने का एहि रीत ...' तुम्हारे यहां की भाषा में गीत और भी मीठा लगता है। लगता है, बस सुनती ही रहूँ ... ये महुआ घटवारिन का गीत है, वो कजरी नदी का घाट था न ,,,, बस उसी का ... अच्छा, तुम्हें आता है ये गीत ,,,, सुनाव न मीता ... इस्स ,,,, गांव का गीत सुनने का बड़ा सौख है, आपको ... "... वो जो महुआ घटवारिन का घाट था न, उसी मुलुक की थी महुआ ,,,, थी तो घटवारिन, लेकिन सौ सतवंती में एक ,,,, उसका बाप दिन दिहाड़े ताड़ी पी के बेहोस पड़ा रहता था ,,,, उसकी सौतेली माँ थी साक्षात राक्षसनी ,,,, महुआ कुंवारी थी ,,,, भरी पूरी दुनिया में कोई न था उसका ..." दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनायी, तुने काहे को दुनिया बनायी ... दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनायी, तुने काहे को ...