पूर्वाञ्चल के लोक संस्कारों और कृषि का पर्व : नेवान (नवान्न): डा. अमरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

 

वैदिक काल से लेकर आज तक भारतीय समाज में शास्त्र एवं लोक का सामंजस्य देखने को मिलता है भारतीय जीवन पद्धति लोक कि धारा वह धारा है, जो अनादि काल से हमारे जीवन से सिंचित करती रही है लोक जीवन कि विविधता और विस्तार ही वह स्रोत है, जिससे हमारे समाज में उल्लास का संचार होता रहा है विविधता एवं विस्तार का आधार हमारी कृषि प्रधान संस्कृति रही है । धरती और प्रकृति का हमारी लोक परम्परा एवं संस्कृति में विशेष महत्व रहा है । हमारा लोक न सिर्फ विविधताधर्मी है वरन बेहतर जीवन जीने के लिए एक मजबूत आधार भी प्रदान करता है ।

लोक कि सरसता में कुछ वैज्ञानिक तत्वों का समावेश भी देखने को मिलता है । लोक कि सरसता एवं वैज्ञानिकता भारत के सभी क्षेत्रों के लोक में देखी जा सकती है । पूर्वी उत्तर प्रदेश कि लोक परम्परा अत्यंत समृद्ध एवं सुदृढ़ रही है । ‘पूर्वाञ्चल की पोटली’ में कला, संस्कृति , सभ्यता, गीत-संगीत, कथा और नाट्य की व्यापक एवं प्राचीन परम्परा के साथ-साथ खेती किसानी से जुड़ी परम्पराओं का भी समावेश देखने को मिलता है । समय के साथ ही हम अपनी जड़ों और परम्पराओं से दूर होते जा रहे हैं । जिस तरह से उत्तर-आधुनिक समय में भौतिक सुख संसाधनों पर आधारित जीवन हमें प्रभावित कर रहा, ऐसे समय में हमें उन परम्पराओं को सहेजना होगा, जिनसे जुड़कर हम अपने जीवन को बेहतर से बेहतरीन बना सकने में सक्षम होंगे ।

भारत एक कृषि प्रधान देश है । पशुधन और खेती की को हमारे पूर्वाञ्चल में भी विशेष महत्व दिया जाता है । हमारे लोक के अधिकांश तीज-त्योहार भी खेती-बाड़ी को आधार बनाकर मनाए जाते हैं । इसी तरह संस्कारों और भावों से सम्पन्न एक परम्परा है –‘नेवान’ । नेवान उस आहट का नाम है, जिससे नई फसल की महक और लोक की चहक को विशेष महत्व दिया जाता है । इस अवसर पर किसानों के परिवार में नई फसल के होने पर विशेष पूजा की जाती है । सबसे पहले हम ‘नेवान’ शब्द के अर्थ को जानेंगे फिर उस परम्परा से परिचित होंगे ।


नेवान’(Nevan) शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से ‘भोजपुरी’ और ‘मगही’ भाषाओं में होता है । इसका अर्थ है- नए भोजन का पहला भोजन । ‘नेवान’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के नव+ अन्न से मना जाता है । जिसका आशय है नए और पवित्र अन्न । नेवान पूर्वाञ्चल में वर्ष भर में दो बार मनाया जाता है । सामान्यतः इस क्षेत्र में वर्ष भर में दो बार फसलें उगाई जातीं हैं , जो निम्नलिखित हैं –

1.   रबी की फसल

2.   खरीफ की फसल

1.   रबी की फसल- रबी की फसल उत्तर भारत में अक्टूबर और नवंबर माह के दौरान बोई जाती है जो कम तापमान में बोई जाती है, फसल की कटाई फरवरी और मार्च महीने में की जाती है। गेंहू, जौ, जई, तोरिया (लाही), राई और सरसों, पीली सरसों, अलसी, कुसुम, रबी मक्का, शिशु मक्का (बेबी कॉर्न) की खेती, चना, मटर, मसूर, रबी राजमा, बरसीम, मशरूम की खेती, आलू की खेती आदि। इसके साथ-साथ विविध प्रकार के साग, हरी धनिया, लहसुन , प्याज की फसल भी इस मौसम में होती है

       इस फसल के समय में वसंत पंचमी के दिन ‘नेवान’ मनाया जाता है नए अन्न के रूप में जौ की फली को काट कर लाया जाता है और उसे भूनकर इस दिन बनाने वाले सभी खाद्य पदार्थों में मिलाकर खाया जाता है इस अवसर पर घरों में माँ सरस्वती की पूजा के साथ-साथ नए अन्न की पूजा का भी प्रावधान होता है इस दिन चने के दाल की पूड़ी, साग, कड़ी-बरी ,पकौड़ी और खीर बनाया जाता है । नए अन्न को खाने के बाद घर के छोटे लोग बड़े लोगों का पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेते हैं और नए फसल के होने का उल्लास मानते हैं ।   

2.   खरीफ की फसल - खरीफ की फसलें (जून-अक्टूबर) मानसून के साथ बोई जाती हैं। खरीफ फसलों में महत्वपूर्ण फसलें धान, मक्का, बाजरा, मूंगफली, तिल, अरहर तथा सोयाबीन इत्यादि हैं। इन फसलों में धान मुख्य खाद्य फसल है जो कि पूरे देश में उगाई जाती हैं और विश्व भर में इसकी अग्रणी खपत है। खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में धान मुख्य खा़द्य फसल है,जो कि पूरे देश में उगाई जाती है और विश्व भर में इसकी अग्रणी खपत है खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में उत्पादकता में कमी के अनेक कारण हैं। इस मौसम में सिंचाई की कमी तथा कभी पानी की अधिकता का फसलों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा मौसम में अधिक शुष्कता तथा तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव खरपतवारों, कीड़ों तथा बीमारियों को न्यौता देता है। जिसके कारण फसलों को सुरक्षित रखना किसान के लिए बहुत बड़ी जिम्मेदारी हो जाती है।

पूर्वाञ्चल में जब इन फसलों में बालियाँ आने लगतीं हैं तब सावन के महीने में ‘नेवान’ मनाया जाता है। नाग-पंचमी के बाद सप्तमी या अष्टमी के दिन ‘नेवान’ मनाया जाता है । इस अवसर पर सांवां ( जो धान में पाई जाने वाली खर है) की फली को काटकर भुना जाता है और इस अवसर पर बनने वाले सभी भोज्य में मिलाकर खाया जाता है।

‘नेवान’ मूलतः पूर्वाञ्चल में नए फसल और नए मौसम से जुड़ा हुआ लोक पर्व है। नेवान (Nevan) भोजपुरी संस्कृति और उत्तर भारत की ग्रामीण परंपराओं में एक महत्वपूर्ण रस्म है। यह रस्म आमतौर पर नई फसल, नए अन्न या फल को सबसे पहले देवता या पितरों को अर्पित करने के बाद स्वयं ग्रहण करने की प्रक्रिया है। यह लोक पर्व हमारी कृषि प्रधान संस्कृति के प्रति हमारे पितरों के योगदान के स्मरण का पर्व है । इस अवसर पर कुछ गीत भी गए जाते हैं, जो निम्नलिखित हैं –

   "ले आईंली नेवान, मोरे अंगना में सोहैं,

लक्ष्मी के रूप, बरुवा के दिन हो..."

शुभ दिन अइले, सगुन भइले, नेवान के दिनवा आजु हो।

सजी गइले बइला, चमक गइले हरवा, गूँजे सुघर आवाज हो॥

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"पहले दान कीजिए, फिर नेवान कीजिए,

नेवान कीजिए, हो नेवान कीजिए..."

“नया खाईं ,पुरान  रखीं”

 

पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोक पर्वों में नेवान का विशेष महत्व है , जो मूलतः हमारी कृषि प्रधान संस्कृति  और प्रकृति प्रेम को दर्शाता है । इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं –

1.   यह उत्साह और उल्लास का पर्व है ।

2.   यह ऋतु के पहले फल या अनाज को पहली बार खाने के महत्व को दर्शाता है ।

3.   यह खुशी का प्रतीक है, जिस पर पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। 

4.   यह ग्रामीण जीवन की जीवंतता को दर्शाता है, इस अवसर पर ढोल बजाय जाता है और लोग एक -दूसरे के प्रति अपने आदर भाव को प्रकट करते हैं।

5.   नए अन्न को अग्नि में आहुति देकर अपने पितरों और देवताओं अर्पित करने के बाद हम ग्रहण करते हैं।

6.   यह प्रकृति प्रेम और खेती-किसानी के महत्व को दर्शाने वाला पर्व है ।

 

 

 

 

 

 

 

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