पूर्वांचल में पर्व, पूजा एवं अध्यात्म : डा. पल्लवी अस्थाना (असिस्टन्ट प्रोफेसर- इंजीनियरिंग) , ऐमिटी यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश ,लखनऊ कॅम्पस लखनऊ



अध्यात्म का अर्थ है 'आत्मा' का अध्ययन अर्थात हमारे स्वयं के होने का अध्ययन करना । व्यक्ति अपने अंदर की आत्मा से साक्षात्कार करते हुये परमात्मा तक पहुँचने की चेष्टा में जिस मार्ग पर चलता है, उसे ही आध्यात्मिकता कहते है। 

भारतीय दर्शन में अध्यात्म बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योकिं आत्मा का परमात्मा से मिलन जीवन की पराकाष्ठा एवं संपूर्णता का द्योतक है। ऐसा भी माना जाता है कि संपूर्णता को प्राप्त करने में कुछ वर्ष नहीं, अपितु कई जन्म लग सकते हैं। इसीलिये भारतीयू दर्शन के अनुसार यात्रा व्यक्ति की नहीं बल्कि उसकी आत्मा की होती है। अनेकों मार्ग से होते हुये व्यक्ति स्वयं को उस अनंत से जोडना चाहता है, जहाँ पर जीवन अनंत में लीन हो जाये और परम तत्त्व से एकात्मता का अनुभव करे |

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

इस श्लोक का अर्थ है - वह (अद:) परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से पूर्ण है। यह जगत भी पूर्ण है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।

हिंदू धर्म में सामान्य जन को अध्यात्म से जोड़ने के लिये भक्ति मार्ग है। हिंदू धर्म में परमात्मा से जुड़ने के लिये संयास लेना आवश्यक नहीं हैं। यहाँ पर दैनिक पद्धति में अपनाये जाने वाले बहुत से क्रिया कर्म और पूजा पाठ द्वारा  भक्ति मार्ग पर चल कर व्यक्ति आध्यमिकता के निकट आ सकता है। भक्तजन प्रतिदिन के जीवन में साधारण कर्म कांड, पूजा-आरती, यज्ञ एवं हवन जैसे विभिन्न साधनों से अपने ईष्ट से जुड़ते हैं। हिंदू पंचाग के अनुसार विशिष्ट तिथियों पर विभिन्न प्रकार के पर्व व त्योहार मनाते है। पर्व और उत्सव मनाने वालों के लिये किसी एक पंथ, जाति अथवा ईष्ट से जुड़े होने की कोई बाध्यता नहीं होती है। ये पर्व सामाजिक रूप से सबको एक सूत्र में पिरोने के लिये मनाये जाते हैं। उत्तर भारत के पूर्वांचल क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के त्योहार एवं उत्सव प्रचलित है। इनमें से कुछ पर्व तो अति प्रसिद्ध है एवं विश्व पटल पर अपनी पहचान बनाये है। कुछ ऐसे है जो प्रायः स्थानीय रूप में अधिक प्रचलन में है। ये सारे पर्व एवं उत्सव व्यक्ति को परिवार, समाज , प्रकृति और ईश्वर से जोड़ने में सहायक होते हैं। कुछ प्रमुख पर्व जैसे मकर संक्राति, वसंत पंचमी, नेवान्न आदि तो सीधे-सीधे कृषि से जुड़े हैं। ये पर्व फसल पूरी हो जाने पर हर्षोल्लास के साथ मनाये जाते है। अधिकतर पर्व को धन्यवाद के रूप में मनाया जाता है, जिसमें हम पृथ्वी, जल, नभ, पेड़, पुष्प आदि  के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। ईष्ट की वंदना भी उत्सव का एक प्रमुख अंग होती है और हर एक होटे से बड़े पर्व में अपने ईष्ट, ईश्वर, कुल देवी / देवता को स्मरण करके भोगादि लगाया जाता है।  उत्सव सामाजिक समरसता बढ़ाते है क्योंकि त्योहारों को लोग अपने घर, परिवार और मित्रों के साथ मनाना पंसद करते हैं। त्यौहार आजकल के भाग दौड़ और व्यस्त मानवीय जीवन में सामाजिक जुडाव का एक माध्यम हो जाते है। जब व्यक्ति अपने-आप से निकलकर प्रकृति, समाज एवं ईश्वर से जुडता है तो धीरे-धीरे उसका रुझान आध्यात्म की ओर होता है क्योंकि अपनी परिधि को बढ़ाना ही उसे संपूर्णता की ओर ले जा सकता है |

  प्रकृति से जुडाव :- कुछ पर्व जैसे मकर संक्राति, नेवान्न, नाग पंचमी आदि कृषि से जुड़े है, और फसल के पूरा होने के बाद मनाये जाते है। नाग पंचमी श्रावण मास में मनाया जाता है और मकर संक्राति सूर्य के उत्तरायण में आने पर मनाया जाता है। दोनों ही पर्व ऐसे समय मनाये जाते है जब मौसम फसल के लिये अनुकूल होता है और मनोरम होता है। तपती गरमी के बाद सावन में फुहारे पड़ती है तो धरती के साथ-साथ हर किसी के जीवन में रौनक आ जाती है। मन प्रसन्न रहता है और आस पास का माहौल भी हरियाली से भरा पूरा रहता है|

ऐसे ही जब कंपकंपाती सर्दी के बाद सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करते है तब मकर संक्राति मनाई जाती है | सर्दी की गुनगुनाती धूप में तिल व गुड़ से बने व्यंजन खाते हुये मन बरबस ही संपूर्ण प्रकृति से एकात्मता का अनुभव करता है। फूल-पौधे भी धूप निकलने से खिले - खिले लगते हैं। छठ पर्व को कार्तिक माह में मनाते है, जब धूप हल्की हो जाती है और हल्की सर्दी का आभास होने लगता है। इस पर्व में सूर्य देवता को अर्घ्य दिया जाता है जोकि संपूर्ण जीवन के प्रणेता है। इस मौसम में बहुत प्रकार की शाक - सब्जी व फल भी उपलब्ध होते है,  जिनका उपयोग प्रसाद व भोग में किया जाता है । वर्ष के अलग-अलग महीनों में पड़ने वाले त्योहारों में पकने वाले व्यंजन और पकवान भी उस मौसन में होने वाली उपज के अनुसार ही होते है जैसे मकर संकृति में नये चावल की खिचडी बनती है, छठ पर गन्ने के रस की खीर बनती है। इन पर्वो के माध्यम से प्रत्येक ऋतु में उपजने वाली फसलों, फलों एवं सब्जियों से जुडाव होता है। जीवन की तमाम गतिशीलता और व्यस्तता में भी अधिकतर लोग थोड़ा सा समय निकालते है और स्वयं को प्रकृति से जोड़ना चाहते है और हमारे पर्व सबको ऐसा अवसर देते है|

समाज से जुड़ाव - पर्व एवं उत्सव समान को भी साथ में लाते हैं। कार्तिक मास, माघ मास, मकर संक्राति, दशहरा आदि जैले त्योहारों पर अनेकों स्थान पर मेले लगते हैं। इन मेलों में लोग अपने परिवार, मित्रगणों और सम्बन्धियों के साथ जाते हैं। घर के बड़े-बूढ़े-बच्चे सब एक साथ घूमने जाते हैं तो उनमें घनिष्ठता बढ़ती है। इन मेलों में अलग-अलग स्थानों से हस्त शिल्य कारीगर, बुनकर और कलाकार आते हैं। एक ही स्थान पर विभिन्न प्रकार की कलाकृतियाँ, कपड़े, मिट्टी एवं लकड़ी का सामान मिलता है। कुछ मेलों में तो देश के विभिन्न राज्यों के व्यापारी आते है, इसके माध्यम से स्थानीय लोग अलग अलग जनपद एवं राज्य की वस्तुयें खरीदते हैं। लोगो में जागरूकता आती है, क्योकि ये मेलें एक तरह से देश भर के कारीगरों की कला की झांकी होती हैं। यहाँ पर आने वाले लोग स्वयं को पूरे देश से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। त्योहारों में लगने वाले मेलें समाज में समरसता का प्रतिनिधित्व करते हैं। होली, दीपावली, छठ, दशहरा आदि त्योहारों में लोग छुट्टीयों में अपने घर पर आते है जहाँ वह पूरे परिवार के साथ त्योहार मनाते है। लोग एक दूसरे के घर जाते हैं। आजकल के व्यस्त जीवन में भी लोग त्योहारों पर एक साथ आना चाहते हैं और समाज से जुड़ना चाहते है। जिस तरह के एकाकी जीवन का प्रचलन हो गया है उसमें ये सारे पर्व एवं उत्सव एक बंधन की भूमिका निभाते है जिससे समाज जुड़ा रहता है। होली मिलन, वसंत पंचमी में स्थानीय क्रार्यक्रम लोगों की भागीदारी से संपन्न होते हैं। कुछ पर्व पर भंडारे का आयोजन होता है जिससे जिसमें समाज का हर वर्ग जुड़ता है।

ईश्वर से जुड़ाव :- भक्तजन प्रतिदिन साधारण कर्मकाण्ड, पूजा-आरती के माध्यम से अपने ईष्ट से जुड़ते हैं। हिंदू वर्ष की विशिष्ट तिथिओं पर अलग-अलग पर्व व त्योहार मनाते हैं। पर्व और उत्सव मनाने के लिये किसी एक पंथ, जाति अथवा ईष्ट से जुड़े होने की बाध्यता नहीं होती है। कुछ पर्व एवं तिथिओं पर व्रत रखने का प्रावधान है। व्रत रखने से पाचन तंत्रिका को विश्राम मिलता है जिससे मन एकाग्र होता होता है और एकाग्र मन ही एकाकार हो सकता है। कुछ लोग नियमित रूप से साप्ताहिक व्रत भी रखते है। व्रत, पूजा-पाठ, त्योहार व्यक्ति को ईश्वर से जोड़ते है। दैनिक जीवन में कुछ क्षणों के लिये व्यक्ति ईश्वर को याद करता है और अपने आप को उसकी अद्‌भुत संरचना का रूप समझता है। तनाव भरे जीवन में जब यह एहसास ही बहुत होता है कि अंततः हमारे ऊपर भी कोई है जो सब कुछ नियम से चला रहा है और कुछ परिस्थितियों को उस सत्ता पर छोड़ सकते हैं। ये विश्वास नित्य कर्म के अनुशासन और प्रयास से आता है। और जब ये विश्वास मन में आ जाता है तो व्यक्ति स्वयं को  अकेला नहीं समझता, बल्कि उस संपूर्ण रचना का अभिन्न अंग बन जाता है जिसके रचयिता का वो भक्त हैं।

जिस तरह से आजकल जीवन में अवसाद, निराशा व एकाकीपन बढ़ रहा है, ये आवश्यक हो गया है कि हमें अपनी जड़ो की ओर लौटना चाहिये। जब मौका मिले, छोटे- बड़े उत्सव मनाये, दैनिक जीवन में नित्य पूजा पाठ करें | हमारी परंपराये एक ऐसी जीवन-शैली का प्रारूप बनाती है जिनमें समरसता और सामाजिकता केंद्र बिंदु है।अपनी जड़ो की ओर लौट कर अपने समयानुसार सबके साथ मिलकर त्योहार मनाने से, पूजा-पाठ के माध्यम से व्यक्ति जब समाज से जुड़ता है, प्रकृति से जुड़ता है और ईश्वर से जुड़ता है तब उसको एकाकीपन कम लगता है। यह अनुभव ही आध्यात्मिकता के लिये आवश्यक होता है और भक्ति भक्त के मन में जो प्रेम होता है वहीं उसे संपूर्णता प्रदान करता है

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