पूर्वाञ्चल लोक का खेल : डॉ. अमरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
प्राचीन यूनानी काल में कई तरह के खेलों की परंपरा स्थापित हो चुकी थी और ग्रीस की सैन्य संस्कृति और खेलों के विकास ने एक दूसरे को काफी प्रभावित किया। खेल उनकी संस्कृति का एक ऐसा प्रमुख अंग बन गया कि यूनान ने ओलिंपिक खेलों का आयोजन किया, जो प्राचीन समय में हर चार साल पर पेलोपोनेसस के एक छोटे से गाँव में ओलंपिया नाम से आयोजित किये जाते थे।
प्राचीन ओलंपिक्स से वर्तमान सदी तक खेल आयोजित किये जाते रहे हैं
और उनका विनियमन भी होता रहा है। औद्योगिकीकरण की वजह से विकसित और विकासशील देशों
के नागरिकों के अवकाश का समय भी बढ़ा है, जिससे नागरिकों को खेल समारोहों में
भाग लेने और दर्शक के रूप में मैदानों तक पहुँचने, एथलेटिक
गतिविधियों में अधिक से अधिक भागीदारी करने और उनकी पहुँच बढ़ी है। मास मीडिया और
वैश्विक संचार माध्यमों के प्रसार से ये प्रवृत्तियाँ जारी रहीं। व्यवसायिकता की
प्रधानता हुई, जिससे खेलों की लोकप्रियता में वृद्धि हुई,
क्योंकि खेल प्रशंसकों ने रेडियो, टेलीविजन और
इंटरनेट के माध्यम से व्यावसायिक खिलाड़ियों के खेल का बेहतरीन आनंद लेना शुरू
किया। इसके अलावा व्यायाम और खेल में शौकिया भागीदारी का आनंद लेने का रिवाज भी
बढ़ा। नई सदी में, नए खेल, प्रतियोगिता
के शारीरिक पहलू से आगे जाकर मानसिक या मनोवैज्ञानिक पहलू को बढ़ावा दे रहे हैं।
इलेक्ट्रॉनिक खेल संगठन दिन पर दिन लोकप्रिय होते जा रहे हैं। आज के स्मार्ट होते
समय में खेलों ने खेल मैदानों के साथ-साथ डिजिटल रूप भी ले लिया है। वीडियो गेम और
मोबाइल गेम ने ना सिर्फ खेलों कि दुनिया बदली है वरन बच्चों की दुनिया भी बदल दी
है।
बदलते परिवेश और बदलती
दुनिया के बीच बहुत से ऐसे खेल हैं जो लुप्त होते जा रहे हैं। लोक जीवन में
प्रचलित बहुत से खेल आज या तो समाप्त हो गए हैं या समाप्त होने के कगार पर हैं ।
आइए पहले हम प्रचलित खेलों के बारे में जानते हैं ,फिर लोक जीवन से जुड़े खेलों पर
चर्चा करेंगे । खेलों को भी हम दो भागों में बांटकर देख सकते हैं –
1.
औपचारिक खेल
2. अनौपचारिक खेल
औपचारिक खेल – इस कोटि के खेलों में वे खेल आते हैं जिनके कुछ
निश्चित नियम होते हैं। और उन्हीं नियमों के आधार पर ये खेल खेले जाते हैं । इस
तरह के खेल अधिकांशतः शिष्ट समाज में देखने को मिलते हैं । इन खेलों में प्रमुख
हैं – क्रिकेट, हॉकी ,फुटबॉल, वॉलीबॉल ,टेनिस, कबबड़ी पोलो, बैडमिंटन, लूडो खो-खो
इत्यादि ।
अनौपचारिक खेल – इस तरह के खेल लोक जीवन में विशेष रूप से प्रचलित
होते हैं । इन खेलों के कोई विशेष नियम नहीं होते , ये खेल अंचल विशेष में प्रचलित
होते हैं । इन खेलों में प्रमुख खेल हैं – आइस-पाइस(चोर-सिपाही), इककखट- दुकखट, ओकका–
बोकका, गिल्ली-डंडा, गोली-काँचा , चिक्का, घूघूआमन्ना, ,घोड़ा-जमाल खाई, उच्च-नीच
और पहेलियों पर आधारित खेल ।
आज के उत्तर आधुनिक समय में मोबाइल पर आधारित जीवन चर्या ने हमारे
जीवन को बहुविध प्रभावित किया है । लोक जन का जीवन तेजी से बदल रहा है , इन सबके
बीच हमारे लोक जीवन की सरसता खत्म होते जा रही है । ऐसे समय हमें उन खेलों के बारे
में जानना चाहिए जो ना सिर्फ हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ के लिए लाभदायक है
वरन हमारे जीवन को सरस भी बनाते हैं ।
आइस-पाइस- आइस पाइस /कलम दुआइत/ लिपा पोती ठप्प । इसे लुक्का-छिपी
या चोर सिपाही भी कहा जाता है ,इस खेल में पहले आइस-पाइस करके सब पास हो जाते हैं
फिर जो बाद में बचत है उसे चोर बनना होता है । बाकी सब लोग छिप जाते हैं , और चोर
को सबको खोजना होता है । यह खेल बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ दोनों के लिए
लाभप्रद होता है ।
इककखट- दुकखट- यह खेल शारीरिक और मानसिक संतुलन का खेल होता है ।
इसमें जमीन पर खाने बनाकर उसमें गोटी फेकी जाती है, और उस खाने तक खिलाड़ी को एक
पैर पर जाना होता है, जिससे हमें शारीरिक संतुलन का अभ्यास होता है ।
ओकका– बोकका – यह खेल एक समय में पूर्वाञ्चल के बच्चों के बहुत
लोकप्रिय था । इस खेल में हाथ को कटरी नुमा करके उसपे ऑकका-बोकका किया जाता है । इस खेल को कहलाते हुए कविता की
तरह पढ़ा जाता है- ओकका- बोकका /तीन तलोका/ लाइया लाठी/ चंदन काठी/ ......।
गिल्ली डंडा- एक होल में गिल्ली को रखा जाता है। दो टीमें बनती हैं
और वे बारी-बारी से गिल्ली को मारकर अंक बना ती हैं। खिलाड़ी डंडे से गिल्ली को दो
बार मारने की कोशिश करता है - एक बार इसे जमीन से उठाने के लिए और दूसरी
बार जहां तक संभव हो इसे मारने के लिए डंडा चलाता है। वहीं क्षेत्र-रक्षण करने वाली टीम गिल्ली को जमीन पर छूने से पहले कैच करने की कोशिश
करती है। गिल्ली डंडा भारत का एक प्राचीन खेल है। ऐसा माना जाता है कि इसकी
उत्पत्ति संभवत: 2500 साल पहले हुई थी ।
लोक जीवन में प्रचलित सभी खेलों क लिए कोई निश्चित नियम नहीं
होते, इन खेलों का उद्देश्य सिर्फ मानसिक और शारीरिक स्वास्थ एवं मनोरंजन। लोक
जीवन में प्रचलित बहुत सी परम्पराएं संसाधनों के न्यूनतम उपयोग पर विशेष जोर होता
रहा है । लोक जीवन से हमें यह सीखने को मिलता है कि किस तरह से प्राकृतिक संसाधनों
का बेहतर प्रयोग कर सकते हैं ।

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